Image Source of प्रागपुर @ Chateau Garli
धौलाधार पर्वतमाला की बर्फीली चोटियों की छाया में बसा प्रागपुर एक शांत, ऐतिहासिक और आध्यात्मिक गांव है। स्लेट की छतों वाली हवेलियां, पत्थरों से बनी गलियां और औपनिवेशिक दौर की वास्तुकला यहां की पहचान हैं। सुबह गांव में मुर्गों की बांग और धुंध से ढके बागानों का दृश्य मन मोह लेता है। दिन में सरसों के फूलों से सजी पगडंडियों पर सैर और शाम को लोकगीतों के बीच दीपों की रोशनी—प्रागपुर हर पल सुकून का अनुभव कराता है।
यूनेस्को हेरिटेज टैग पाने वाला यह भारत का पहला हेरिटेज गांव है। यहां समय ठहरता नहीं, बल्कि धीमे-धीमे बहता है और हर आगंतुक को आत्मिक शांति का अनुभव कराता है।
16वीं शताब्दी में स्थापित इस गांव को 1997 में राज्य सरकार ने ‘भारत का पहला हेरिटेज विलेज‘ (First Heritage Village of India) घोषित किया था। आज भी यहाँ की पत्थर से बनी गलियां (Cobblestone streets) और सदियों पुरानी हवेलियां पर्यटकों को एक अलग ही दुनिया का अहसास कराती हैं।
वास्तुकला का बेजोड़ संगम: इंडो-यूरोपीय शैली: प्रागपुर की सबसे बड़ी खासियत यहाँ की वास्तुकला है। यहाँ की हवेलियों में आपको भारतीय, मुगल, ब्रिटिश और पुर्तगाली शैलियों का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है। कुठियाला सूद समुदाय द्वारा बनाई गई ये इमारतें आज भी अपनी मजबूती और सुंदरता के लिए जानी जाती हैं।
प्रागपुर कैसे पहुंचे?
हवाई मार्ग: कांगड़ा का गग्गल एयरपोर्ट (लगभग 35 किमी) प्रागपुर का निकटतम हवाई अड्डा है। दिल्ली से नियमित उड़ानें उपलब्ध हैं। एयरपोर्ट से टैक्सी द्वारा सीधे गांव पहुंचा जा सकता है।
रेल मार्ग: पठानकोट जंक्शन (60 किमी) और ऊना (67 किमी) प्रमुख रेलवे स्टेशन हैं, जहां से दिल्ली, मुंबई सहित कई शहरों से ट्रेनें आती हैं। स्टेशन से टैक्सी या बस लेकर प्रागपुर पहुंचा जा सकता है।
सड़क मार्ग: धर्मशाला (60 किमी) और पालमपुर (20 किमी) से NH-503 के जरिए सड़क मार्ग सुगम है। राज्य परिवहन की बसें नियमित रूप से चलती हैं।
गांव के भीतर घूमने के लिए पैदल चलना या साइकिल किराए पर लेना सबसे अच्छा विकल्प है।

घूमने का सबसे अच्छा समय
मार्च से जून और सितंबर से नवंबर के बीच का मौसम (15°C–25°C) सबसे अनुकूल रहता है। इस समय न तो बारिश की बाधा होती है और न ही अत्यधिक ठंड।
साथ रखें: हल्के गर्म कपड़े, आरामदायक जूते, दूरबीन (बर्ड वॉचिंग के लिए) और मंदिर दर्शन हेतु शॉल।
प्रागपुर के प्रमुख दर्शनीय स्थल
1️ स्वास्थानी माता मंदिर: रक्कड़ पहाड़ी पर स्थित यह दुर्लभ मंदिर भक्तों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। माघ पूर्णिमा के मेले के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। पहाड़ी पर चढ़ाई के बाद कांगड़ा घाटी का अद्भुत दृश्य दिखाई देता है।
2️ मां बगलामुखी मंदिर: बनखंडी में स्थित यह शक्तिपीठ अपनी आध्यात्मिक शक्ति के लिए प्रसिद्ध है। मंगलवार के दिन यहां विशेष हवन और पूजा आयोजित होती है। भक्त विजय और साहस की कामना लेकर यहां आते हैं।
3️ गरली गांव: प्रागपुर से मात्र 3 किमी दूर स्थित गरली अपनी इटैलियन शैली की हवेलियों और औपनिवेशिक वास्तुकला के लिए जाना जाता है। यहां की गलियों में कारीगर लकड़ी की नक्काशी और पेंटिंग का काम करते नजर आते हैं। कई हवेलियां अब बुटीक होटल में बदल चुकी हैं।
4️ द जज कोर्ट: प्रागपुर के केंद्र में स्थित यह औपनिवेशिक हवेली अब एक हेरिटेज होटल और संग्रहालय है। यहां पुराने दस्तावेज, फर्नीचर और तस्वीरें कांगड़ा के इतिहास को जीवंत करती हैं। हरे-भरे लॉन में बैठकर चाय का आनंद लेना विशेष अनुभव है।
5 ‘द ताल’ (The Taal): गांव के बीचों-बीच स्थित यह प्राचीन जलाशय प्रागपुर का हृदय कहलाता है। इसके चारों ओर बनी पुरानी सराय और सामुदायिक भवन यहाँ के सामाजिक जीवन का केंद्र रहे हैं। ‘ताल’ की शांति और इसके आसपास की वास्तुकला फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए स्वर्ग है।
प्रागपुर में ठहरने के लिए बेहतरीन होटल
- The Judge’s Court and Chateau Garli: हेरिटेज सुइट्स और संग्रहालय जैसी अनुभूति
- मशरूह हेरिटेज हवेली: मध्यम बजट में शाही ठहराव
- गरली होमस्टे: स्थानीय परिवारों के साथ पारंपरिक पहाड़ी आतिथ्य

3 दिन की प्रागपुर यात्रा योजना
दिन 1: जजेज कोर्ट संग्रहालय से शुरुआत करें। इसके बाद शक्ति मंदिर और गरली गांव की हवेलियों का भ्रमण करें। शाम को बोनफायर और लोककथाओं का आनंद लें।
दिन 2: सुबह स्वास्थानी माता मंदिर में आरती करें। इसके बाद मां बगलामुखी मंदिर और ज्वालामुखी मंदिर (25 किमी) जाएं। वापसी में चाय बागानों का आनंद लें।
दिन 3: पालमपुर चाय बागान (20 किमी) और आंद्रेटा पॉटरी गांव का भ्रमण करें। कांगड़ा किला (30 किमी) देखें और शाम को स्थानीय बाजार से हस्तशिल्प खरीदें।
प्रागपुर में क्या करें?
- हेरिटेज वॉक और हवेलियों की खोज
- पहाड़ी मंदिरों की ट्रेकिंग
- पालमपुर में चाय चखना
- आंद्रेटा में पॉटरी बनाना सीखें
- बागानों में पिकनिक
प्रागपुर का प्रसिद्ध भोजन: चना मदरा, धाम थाली, सिद्दू, बाबरू, मित्ठा, कांगड़ा चाय। होमस्टे में परोसी जाने वाली पारंपरिक पहाड़ी थाली का स्वाद जरूर लें।

खरीदारी के लिए क्या खास?
- ऊनी शॉल और पश्मीना
- लकड़ी के खिलौने
- कांगड़ा पेंटिंग
- स्थानीय हस्तशिल्प
- कांगड़ा चाय
आसपास घूमने की जगहें
- धर्मशाला/मैक्लोडगंज (60 किमी)
- कांगड़ा किला (30 किमी)
- पालमपुर (20 किमी)
- हरिपुर गुलेर (27 किमी)
निष्कर्ष
प्रागपुर सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि शांति और विरासत का जीवंत अनुभव है। यहां हवेलियों की छाया, मंदिरों की घंटियां, पहाड़ी भोजन की खुशबू और धौलाधार की ठंडी हवा हर यात्री को सुकून देती है। यदि आप भीड़-भाड़ से दूर इतिहास, अध्यात्म और प्रकृति का संगम चाहते हैं, तो प्रागपुर आपकी अगली यात्रा का आदर्श ठिकाना है।
प्रागपुर आपको शांति का वह उपहार देता है, जो यात्रा खत्म होने के बाद भी दिल में बस जाता है।
By: Anushka Singhal


